बिहार के कराकाट में मनरेगा की जमीनी हकीकत

समय पर रोजगार नहीं मिलने से परेशान लोग, नहीं मिल रहा 100 दिनों का काम, तय मेहनताना से कम मजदूरी, कट रहे मास्टर रोल से नाम और अधिकारियों द्वारा यह दावा कि सब कुछ ठीक है—आखिर ज़मीनी हकीकत क्या है?

आज की इस रिपोर्ट में हम बात कर रहे हैं मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम – MGNREGA) की, जो सीधे तौर पर रोजगार से जुड़ी हुई योजना है। रोजगार, जो आज हमारे देश की एक गंभीर और बढ़ती समस्या बनता जा रहा है। भारत के लगभग हर परिवार को अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करने के लिए रोजगार की आवश्यकता है।

भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी गाँवों में रहता है, जहाँ खेती के अलावा आय का कोई स्थायी और मज़बूत साधन मुश्किल से ही उपलब्ध है। ऐसे लोगों के लिए भारत सरकार द्वारा 7 सितंबर 2005 को मनरेगा अधिनियम पारित किया गया, जिसे 2 फरवरी 2006 से लागू किया गया। इस अधिनियम के तहत हर ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में न्यूनतम 100 दिनों का मज़दूरी आधारित रोजगार देने की कानूनी गारंटी दी गई थी। इन 100 दिनों के काम के बदले प्रतिदिन तय मेहनताना देने का भी प्रावधान है।

वर्षों पहले शुरू हुई इस रोजगार गारंटी योजना की ज़मीनी हकीकत आज क्या है—अगर बात करें बिहार के रोहतास ज़िले के बायोडेहरी गाँव की, तो यहाँ आज भी कई परिवार मनरेगा के 100 दिनों के रोजगार पर निर्भर हैं। लेकिन यहाँ की स्थिति बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है। लोग सरकार के इस 100 दिन के रोजगार के वादे से परेशान और निराश नज़र आते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि यहाँ मनरेगा के तहत काम मिलना बेहद मुश्किल है। और अगर कभी काम मिल भी जाता है, तो मजदूरी समय पर नहीं मिलती। कई मामलों में जब पैसा खाते में आता भी है, तो वह तय मजदूरी से काफी कम होता है।

गाँव के ही निवासी शतेंद्र सिंह (मनरेगा मजदूर) बताते हैं,

“काम करने के बाद पैसा समय पर नहीं मिलता। लगभग सभी मजदूरों का पैसा बकाया है—किसी का पाँच हजार, किसी का सात हजार तो किसी का दस हजार रुपये तक। हम लोग आवेदन देकर काम मांगते हैं, तब जाकर काम मिलता है। अभी भी हमने आवेदन दे रखा है, शायद जल्द काम पर जाएँगे। लेकिन जब तक मास्टर रोल नहीं दिया जाता, हम काम पर नहीं जाते, क्योंकि हम 20 लोगों का नाम देते हैं और उसमें से 5 लोगों का नाम मास्टर रोल से काट दिया जाता है।”

शतेंद्र आगे कहते हैं कि उनके परिवार में 10 सदस्य हैं और सरकार द्वारा दी जा रही 200 से 250 रुपये की दैनिक मजदूरी में इतने बड़े परिवार का पालन-पोषण करना बेहद मुश्किल है। इसी वजह से वे सरकार से लगातार न्यूनतम मजदूरी को 1000 रुपये प्रतिदिन करने की माँग कर रहे हैं।

वहीं एक अन्य मनरेगा मजदूर कमला देवी बताती हैं कि शुरुआत में आवेदन देने पर उन्हें कुछ दिनों के लिए काम मिला, लेकिन बाद में उनका नाम मास्टर रोल से काट दिया गया। उन्होंने लगभग 60 दिन काम किया, लेकिन अब तक पूरी मजदूरी नहीं मिली है। अपने और पति के जीवन-यापन को लेकर वे बेहद चिंतित हैं। महंगाई के इस दौर में गुज़ारा कैसे होगा—यह सवाल उन्हें लगातार परेशान करता है, खासकर तब जब उनके बच्चों ने उनसे नाता तोड़ लिया है।

मनरेगा मजदूर ब्रिजभूषण कहते हैं,

“हमारे पास पति-पत्नी का जॉइंट मनरेगा जॉब कार्ड है। काम करने के बाद समय पर पैसा नहीं मिलता। काफी मशक्कत के बाद भी केवल 50 प्रतिशत मजदूरी ही मिल पाती है, बाकी पैसा अटका रहता है। गाँव में अगर मनरेगा के अलावा कोई और मजदूरी मिल जाए, तो 300 से 400 रुपये रोज़ मिल जाते हैं, लेकिन वह काम भी 10 दिनों से ज़्यादा नहीं होता।”

ब्रिजभूषण बढ़ती महंगाई और बेरोज़गारी को लेकर भी गहरी चिंता जताते हैं। उनका कहना है कि सरकार द्वारा दी जा रही मजदूरी में अगर परिवार का पेट भर जाए, तो वही बहुत है—पढ़ाई, इलाज और अन्य ज़रूरतों की बात तो दूर की है। उनका कहना है कि 100 दिनों की रोजगार गारंटी होने के बावजूद किसी को 30 तो किसी को 40 दिनों से ज़्यादा काम नहीं मिल पाता। और अगर काम मिल भी जाए, तो पूरी मजदूरी हाथ में नहीं आती।

वे कहते हैं,

“जब सरसों का तेल ही 200 से 250 रुपये लीटर है, तो एक दिन की कमाई तेल की एक बोतल में ही खत्म हो जाती है। ऐसे में परिवार कैसे चले?”

यह कहानी सिर्फ शतेंद्र, कमला या ब्रिजभूषण की नहीं है। गाँव के लगभग हर परिवार की दास्तान कहीं न कहीं इससे मिलती-जुलती है। मनरेगा, जिसे सरकार ने लोगों को आर्थिक सहारा देने के उद्देश्य से शुरू किया था, आज कई जगहों पर लोगों के लिए एक गंभीर समस्या बनता नज़र आ रहा है।

पहले लोग खेती, पशुपालन या अन्य छोटे-मोटे कामों पर निर्भर रहते थे। मनरेगा आने के बाद लोगों को 100 दिनों के रोजगार की उम्मीद मिली और वे इस योजना पर आश्रित हो गए। लेकिन सवाल यह है कि आखिर धरातल पर यह योजना सही तरीके से क्यों काम नहीं कर पा रही है?

काराकाट में ग्रामीणों द्वारा लगाए गए आरोपों पर मनरेगा पदाधिकारी गजेंद्र कुमार (वर्तमान में प्रखंड जी राम जी पदाधिकारी, काराकाट) का कहना है कि लोग मनरेगा के तहत काम करने के लिए इच्छुक हैं और आवेदन भी दे रहे हैं। उनके अनुसार,

“धरातल पर मनरेगा सुचारु रूप से चल रहा है। वर्तमान में 255 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी दी जा रही है। केंद्र सरकार भविष्य में मनरेगा को ‘जी-राम-जी’ योजना के तहत विस्तारित करने जा रही है, जिसमें रोजगार के दिन 100 से बढ़ाकर 125 किए जाएंगे और अधिक राशि खर्च की जाएगी।”

हालाँकि, अधिकारियों के इन दावों और ग्रामीणों के अनुभवों के बीच ज़मीन-आसमान का फर्क साफ दिखाई देता है। अगर सब कुछ सही चल रहा है, तो फिर इतने लोग शिकायत क्यों कर रहे हैं? सवाल कई हैं—मेरे भी और आम लोगों के भी—लेकिन इनका जवाब कौन देगा, यह साफ नहीं है।

काराकाट से सामने आई यह तस्वीर बताती है कि लोग परेशान हैं, उम्मीद खोते जा रहे हैं और अपने भविष्य को लेकर गहरी चिंता में हैं। पर ये सिर्फ बिहार के एक गाँव की ऐसी तस्वीर है, या फिर भारत का हर दूसरा गाँव ऐसी ही कोई कहानी कहने को तैयार है?

विशेष धन्यवाद – टोनी लाल अलकर को।

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Sumith Raj

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