जब किसी देश का कुल खर्च उसके राजस्व (Revenue) से अधिक हो जाता है, तब वह देश अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कर्ज लेता है। कोई भी देश मुख्य रूप से दो तरीकों से कर्ज लेता है—
पहला, आंतरिक कर्ज (Domestic Debt) और दूसरा, बाहरी कर्ज (External/Foreign Debt)।
वित्त मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2025 तक भारत पर कुल सार्वजनिक कर्ज लगभग ₹185.94 लाख करोड़ (लगभग $2.09 ट्रिलियन से अधिक) होने का अनुमान है। इसके बावजूद भारत खुद को कई अन्य देशों की तुलना में आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में मानता है।
अगर भारत के कुल कर्ज की संरचना पर नज़र डालें, तो इसमें लगभग 80 प्रतिशत कर्ज आंतरिक स्रोतों से लिया गया है। यानी यह भारत के भीतर का ही पैसा है—आम जनता की बचत।
भारत सरकार ने मुख्य रूप से सरकारी बैंकों में जमा धन, PF फंड, और बीमा कंपनियों में जमा राशि को कर्ज के रूप में उपयोग किया है।
भारत ने बहुत कम मात्रा में विदेशी कर्ज लिया है। इसका एक बड़ा लाभ यह है कि भारत को विदेशी मुद्रा के उतार-चढ़ाव का अधिक जोखिम नहीं उठाना पड़ता।आमतौर पर सरकारें कर्ज से प्राप्त धन को बुनियादी ढांचे के विकास, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, और रोज़गार सृजन में खर्च करती हैं। भारत में भी ऐसा ही होता है, लेकिन यहाँ कर्ज का एक बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज के ब्याज और ऋण भुगतान में भी इस्तेमाल किया जाता है।
भारत खुद को अन्य देशों से बेहतर स्थिति में क्यों मानता है?
इसका सीधा कारण अन्य देशों की आर्थिक स्थिति है।
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था माने जाने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका के पास एक और रिकॉर्ड भी है—वह दुनिया का सबसे अधिक कर्ज लेने वाला देश है। वर्तमान समय में अमेरिका पर लगभग 36 से 38 ट्रिलियन डॉलर का कुल कर्ज है।
वहीं जापान पर करीब 10 ट्रिलियन डॉलर, और चीन पर लगभग 9 से 10 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज है।
इन देशों की तुलना में भारत का कर्ज न सिर्फ़ कम है, बल्कि उसका बड़ा हिस्सा घरेलू स्रोतों से लिया गया है, जिससे भारत की आर्थिक स्थिरता बनी रहती है।
कर्ज का जनता पर क्या असर पड़ता है?
जब कोई देश कर्ज लेता है, तो उसका प्रभाव वहाँ की जनता की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ता ही है।
भले ही कर्ज लेकर विकास योजनाएँ चलाई जाएँ, लेकिन जब सरकार को ऋण और ब्याज चुकाना होता है, तो अक्सर—
- जनता पर टैक्स का बोझ बढ़ता है
- रोज़मर्रा की ज़रूरी वस्तुएँ महँगी होती हैं
- सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं में कटौती होती है
कुल मिलाकर, कर्ज का दबाव अंततः आम नागरिक पर ही पड़ता है।
कर्ज का सही उपयोग और लापरवाही
अगर कोई देश कर्ज लेकर उसका सही और दूरदर्शी उपयोग करे, तो इससे जनता को बड़ा लाभ हो सकता है।
उदाहरण के तौर पर, एक ओर जापान है, जहाँ भारी कर्ज के बावजूद जनता को उच्च स्तर की सुविधाएँ मिलती हैं, वहीं दूसरी ओर श्रीलंका है, जहाँ कर्ज का सही उपयोग न होने के कारण गंभीर आर्थिक संकट देखने को मिला।
आज के दौर में यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है कि कौन सा देश कितना कर्ज ले रहा है, बल्कि यह ज़्यादा मायने रखता है कि
उस कर्ज का उपयोग देश और जनता की भलाई के लिए कैसे किया जा रहा है।
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